Shayari
टूटता हूँ, बिखरता हु, बदहोश हो जाता हु, माँ !!
अब बहुत याद आती है घर की, बने तेरे हाथ की रोटियां मुझे शायद बुलाती है माँ !!
नहीं भुला है तेरा ये लाडला किस तरह से तू जान जाती थी मेरी कमी को,
अब बहुत याद आती है घर की माँ!!
लड़ रहा हूँ ज़माने से खुश रहने को माँ!!
वो शुकुन की नहीं मिलता मखमल के सोफे पे, जो मिलता था तेरे गोद में माँ!!
बहुत दूर आ गया हूँ, बहुत नाम कमा लिया शायद उतना ही दूर तुझसे हो गया हूँ
नहीं भरता पेट मेरा इन खानो से माँ, शायद तेरे हाथ की बानी रोटियां बुलाती है माँ!!
लव यू माँ फिरसे छुपा ले मझे अपने आँचल में माँ डर लगता है ज़माने के इस बेरुखी से माँ!!

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